गौतम ऋषि का श्राप और पत्थर की अहिल्या! जानें कैसे किया श्रीराम ने उद्धार
प्राचीन काल से ही दुनिया में महिलाओं को तरह-तरह की अग्नि परीक्षाओं से गुजरना पड़ा है. माता सीता हूं या सती सावित्री या फिर ऋषि पत्नी अहिल्या सदैव ही महिलाओं को जीवन में तरह-तरह की सामाजिक कुरीतियों का सामना करना पड़ा है आज हम आपको गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या के बारे में बताएंगे कि किस तरह उन्हें श्राप दिया गया था जिसके बाद प्रभु श्री राम ने उनका उद्धार किया.
अहिल्या की कथा : एकबार प्रातःकाल जब राम और लक्ष्मण ऋषि विश्वामित्र के साथ मिथिलापुरी के वन उपवन आदि देखने के लिये निकले तो उन्होंने एक उपवन में एक निर्जन स्थान देखा. राम बोले, “भगवन्! यह स्थान देखने में तो आश्रम जैसा दिखाई देता है किन्तु क्या कारण है कि यहां कोई ऋषि या मुनि दिखाई नहीं देते?” विश्वामित्र जी ने बताया, “यह स्थान कभी महात्मा गौतम का आश्रम था. वे अपनी पत्नी अहिल्या के साथ यहां रह कर तपस्या करते थे. एक दिन जब गौतम ऋषि आश्रम के बाहर गये हुये थे तो उनकी अनुपस्थिति में इन्द्र ने गौतम के वेश में आकर अहिल्या से प्रणय याचना की. यद्यपि अहिल्या ने इन्द्र को पहचान लिया था तो भी यह विचार करके कि मैं इतनी सुन्दर हूं कि देवराज इन्द्र स्वयं मुझ से प्रणय याचना कर रहे हैं, अपनी स्वीकृति दे दी. जब इन्द्र अपने लोक लौट रहे थे तभी अपने आश्रम को वापस आते हुये गौतम ऋषि की दृष्टि इन्द्र पर पड़ी जो उन्हीं का वेश धारण किये हुये था. वे सब कुछ समझ गये और उन्होंने इन्द्र को शाप दे दिया. इसके बाद उन्होंने अपनी पत्नी को शाप दिया कि रे दुराचारिणी! तू हजारों वर्ष तक केवल हवा पीकर कष्ट उठाती हुई यहां राख में पड़ी रहे. जब राम इस वन में प्रवेश करेंगे तभी उनकी कृपा से तेरा उद्धार होगा. तभी तू अपना पूर्व शरीर धारण करके मेरे पास आ सकेगी. यह कह कर गौतम ऋषि इस आश्रम को छोड़कर हिमालय पर जाकर तपस्या करने लगे. इसलिये हे राम! अब तुम आश्रम के अन्दर जाकर अहिल्या का उद्धार करो.”
अहिल्या के तारणहार प्रभू श्रीराम : विश्वामित्र जी की बात सुनकर वे दोनों भाई आश्रम के भीतर प्रविष्ट हुये. वहां तपस्या में निरत अहिल्या कहीं दिखाई नहीं दे रही थी, केवल उसका तेज सम्पूर्ण वातावरण में व्याप्त हो रहा था. जब अहिल्या की दृष्टि राम पर पड़ी तो उनके पवित्र दर्शन पाकर एक बार फिर सुन्दर नारी के रूप में दिखाई देने लगी. नारी रूप में अहिल्या को सम्मुख पाकर राम और लक्ष्मण ने श्रद्धापूर्वक उनके चरण स्पर्श किये. उससे उचित आदर सत्कार ग्रहण कर वे मुनराज के साथ पुनः मिथिला पुरी को लौट आये..
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