कृषि नीतियों पर गरमाई राजनीति, आदिवासी हित बना मुद्दा
बड़वानी|मध्यप्रदेश विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने बड़वानी में आयोजित कृषि कैबिनेट बैठक को लेकर सरकार पर निशाना साधा है. उन्होंने सवाल उठाया कि क्या भगोरिया देखने या कैबिनेट बैठक करने से आदिवासी किसानों का वास्तविक विकास हो जाएगा. उन्होंने कहा कि दो दशक से सत्ता फर काबिज भाजपा सरकार ने ‘कृषक कल्याण वर्ष 2026’ के तहत भोपाल से करीब 350 किलोमीटर दूर आदिवासी बहुल बड़वानी जिला के नागलवाड़ी में पहली ‘कृषि कैबिनेट’ बैठक आयोजित की. दावा किया गया कि इससे किसानों को सीधा लाभ मिलेगा और आय दोगुनी करने के लिए नई योजनाएं आएंगी, लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग है|
‘केवल औपचारिकता पूरी करने की कोशिश की’
उमंग सिंघार ने आरोप लगाया कि बैठक में वरला और पानसेमल के लिए एक सिंचाई परियोजना को मंजूरी देकर “औपचारिकता पूरी” करने का प्रयास किया गया. उन्होंने कहा कि सरसों को भावांतर योजना में शामिल करने का फैसला भी क्षेत्रीय फसल पैटर्न से मेल नहीं खाता, क्योंकि निमाड़ में मुख्य रूप से कपास, मक्का और सोयाबीन की खेती होती है. उन्होंने कहा कि आधुनिक कृषि उपज मंडी की घोषणा भी पुरानी है, जिसे नए रूप में पेश किया गया. कुल मिलाकर यह बैठक किसान कल्याण से अधिक प्रचार और छवि निर्माण का माध्यम प्रतीत होती है|
कपास उद्योग का पतन और CCI पर सवाल
नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि बड़वानी जिले की प्रमुख फसलें कपास, सोयाबीन, मक्का और फलों में केला और पपीता हैं. यदि इनसे जुड़े उद्योग स्थापित किए जाते, तो आदिवासी किसानों को वास्तविक लाभ मिलता. उन्होंने आरोप लगाया कि जिले में कपास उद्योग लगभग समाप्त हो चुका है|कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (CCI) पर सवाल उठाते हुए सिंघार ने कहा कि MSP पर खरीद का दावा किया जाता है, लेकिन छोटे और मझोले किसान पहले ही व्यापारियों को फसल बेचने को मजबूर हो जाते हैं. CCI की खरीद बाद में शुरू होती है, जिससे बिचौलियों को फायदा मिलता है. उन्होंने याद दिलाया कि सेंधवा ब्लॉक कभी ‘कॉटन बॉल’ के नाम से जाना जाता था, लेकिन अधिक मंडी टैक्स और अन्य कारणों से व्यापार महाराष्ट्र और गुजरात की ओर शिफ्ट हो गया है|
मक्का, बीमा और पलायन का मुद्दा
उमंग सिंघार ने कहा कि पिछले वर्ष किसानों को मक्का ₹12–14 प्रति किलो के भाव पर बेचना पड़ा, जबकि बाजार में कीमत ₹35 तक थी. प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत 2025 खरीफ सीजन में 30,324 किसानों से लगभग 52 करोड़ रुपये प्रीमियम के रूप में लिए गए, लेकिन केवल 22 किसानों को कुल ₹2 लाख का क्लेम मिला, जो चिंताजनक है. उन्होंने कहा कि जिले में तीन इंडस्ट्रियल पार्क और एबी रोड (नेशनल हाईवे) से कनेक्टिविटी होने के बावजूद उद्योग विकसित नहीं हो पाए. परिणामस्वरूप पलायन बढ़ रहा है. नागलवाड़ी से सटे राजपुर-झुलवानिया क्षेत्र से प्रतिदिन सैकड़ों मजदूर गुजरात और महाराष्ट्र काम के लिए जा रहे हैं|
‘हर साल नकुसान का मुआवजा नहीं मिलता है’
उमंग सिंघार ने कहा कि जिले के 90 से अधिक गांव सरदार सरोवर डैम के डूब क्षेत्र में आते हैं. हर वर्ष नुकसान के बावजूद मुआवजा समय पर नहीं मिलता. उन्होंने दावा किया कि नीति आयोग के मल्टी-डायमेंशनल पॉवर्टी इंडेक्स में यह जिला पांचवें स्थान पर है. जिले में 60 हजार से अधिक बच्चे अंडरवेट हैं और 23% से 55% तक बच्चे कुपोषण से ग्रस्त हैं|
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